
एक बार फिर छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में सी आर पी एफ के जवान नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं .हर बार ऐसी बड़ी घटना के बाद अफ़सोस जाहिर करने के सिवा हम कुछ नहीं कर पाते हैं ....पर एक बात हमेशा कचोटती है ...इतनी बड़ी सरकारी मशीनरी बार बार फेल क्यों हो रही है ?...इसका एक मतलब तो साफ़ है ...हमारी रणनीति में खामियां हैं ...पर मेरे ज़हन में यह सवाल उठ रहा है क्या नक्सली हमसे मानसिक और रणनीतिक दृष्टी ज्यादा दृढ हो गए हैं ?
चिंतलनार में हुई घटना को अभी दो महीने गुजर चुके हैं मगर सरकार भारतीय सेना को इस अभियान में शामिल करने के मुद्दे पर अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है ...एक तरफ तो सुरक्षा बलों के बड़े अधिकारी शुरू से ट्रेनिंग में किसी भी तरह की कमी की बात को नकारते आये हैं मगर बार बार ऐसी घटनाओं का होना कहीं न कहीं आधारभूत संरचना में कमी को प्रदर्शित करता है ..और इस कमी को नक्सालियों ने भांप लिया है इसी वजह से वो हर बार अपने मंसूबों को अमलीजामा पहनाने में कामयाब हो जाते हैं ऐसे में बारिश का मौसम भी आ गया है ऐसे वक़्त में जवाबी कार्यवाही में अनजान जंगलों में घुसना सुरक्षा बलों के लिए अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा...
कहीं न कहीं हमने अपने दुश्मन को कमजोर समझने की भूल की है .......और इसका परिणाम आज हमें सुरक्षाबल के जवानों की मौत के रूप में मिला है ...जब सरकार के बातचीत के प्रस्ताव को नक्सली एक सिरे से नकार चुके हैं ..तो फिर हम क्यों अपना वक़्त जाया करके उनके साथ बातचीत की पहल करते हैं ..इस वक़्त कम से कम एक बार ऐसी ठोस कार्यवाही करने की आवश्यकता है जिससे नक्सली बातचीत के रास्ते पर खुद ही पहुचे .....नक्सलियों को यह मान लेना चाहिए कि सुख ,समृधि ,शांती और सत्ता का रास्ता माओ के बन्दूक वाले रास्ते को छोड़कर इन्ही जंगल की पगडंडियों से होकर ही जायेगा ...माओ का दिखाया रास्ता उन्हें शांति पथ पैर नहीं ले जा पायेगा .
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